BY: NIDHI JANGIR 1.7K | 0 | 3 years ago
बनारस का विशाल: आईआईटी से मास्टर डिग्री लेने वाले बनारस के लाल ने अपने आप को कामयाब बनाने के बजाय गरीब आदिवासियों का जीवन संवारना अच्छा समझा। 35,000 आदिवा.
बनारस के विशाल किसान परिवार से रखते हैं संबंध
साधारण से परिवार में जीवन व्यतीत करने वाले विशाल के पिता और दादा किसान थे। किसानी करने के अलावा इनके पास कोई और बिजनेस नहीं था। उसके बावजूद भी विशाल के पिता ने विशाल को पढ़ाने में किसी प्रकार की कोई कसर नहीं रखी। विशाल आईआईटी करना चाहते थे इसमें उनका काफी मन था। लेकिन उन्होंने 12वीं के दौरान दो बार प्रयास किया फिर भी सफल नहीं हो पाए। जिस वजह से उन्होंने अपना समय व्यतीत न करते हुए आईआईटी के बजाय कृषि इंजीनियरिंग में प्रवेश ले लिया।
विशाल के इंजीनियरिंग में प्रवेश लेने के बाद भी उनका मन आईआईटी में बना रहा, उन्होंने ग्रेजुएशन ना सही लेकिन मास्टर की पढ़ाई आईआईटी से करने की ठानी। और इसके पीछे यही वजह रही कि वह ग्रेजुएशन से पहले ही साल गेट की तैयारी में लग गए। अपनी पूरी तैयारी के साथ विशाल ने गेट की परीक्षा दी। और अपने पहले ही प्रयास में इसे पास कर लिया। विशाल की इतनी मेहनत के कारण उन्हें आईआईटी खड़कपुर में प्रवेश मिल गया और उन्होंने साथ ही साथ फूड प्रोसेसिंग की पढ़ाई करने का भी मन बनाया।
पढ़ाई के साथ-साथ विशाल ने कृषि से संबंधित ऐसी बातें जाने जिनसे उन्हें विश्वास हो गया कि अगर किसानों को सही रहा है दी जाए तो वह भी खेती से अच्छा खासा धन अर्जित कर सकते हैं और यही वजह रही की पढ़ाई के दौरान यह अक्सर खड़कपुर के आसपास के आदिवासी इलाकों में जाते रहे। और उनकी गरीबी हालत देख विशाल से रहा नहीं गया और उनकी मदद करने की ठान ली। साथ ही साथ विशाल के एक और समस्या थी वह इनके घर की आर्थिक स्थिति काफी कमजोर होने के कारण इन पर नौकरी करने का दबाव बना रहा। इन्हीं कारणों से विशाल ने एक वक्त के लिए अपनी इच्छा को मन ही मन मारते हुए । शाहजहांपुर की एक राइस मिल में नौकरी करना चालू कर दिया।
विशाल को इतना टाइम नहीं मिलता था कि वे किसानों की हर वक्त सहायता कर पाए। फिर भी वह आदिवासी किसानों से मिलते रहे और कृषि से संबंधित उन्हें ट्रेनिंग देते रहे। वक्त के साथ-साथ विशाल की नौकरी भी बदल गई वर्ष 2014 में उड़ीसा की एक कॉलेज में बतौर असिस्टेंट प्रोफेसर पढ़ाने का अवसर प्राप्त हुआ यहां उन्हें आदिवासियों की सहायता करने का मौका भी मिला। वे कॉलेज के बाद किसानों को ट्रेनिंग देते थे। विशाल को कॉलेज के द्वारा मिले एनएसडीसी के प्रोजेक्ट के द्वारा विशाल कुछ पिछड़े गांवों को स्मार्ट सिटी के रूप में बदलना चाहते थे। इस प्रोजेक्ट के कारण विशाल अपना ज्यादातर समय गांव के किसानों के साथ बिताने लगे।
इसी के साथ आदिवासियों की ट्रेनिंग हुई स्टार्ट
बनारस के विशाल ने अपने ट्रेनिंग के वक्त ही आदिवासी गांव की शक्ल ही बदल डाली। विशाल ने सोलर सिस्टम लगवाए, गोबर गैस प्लांट चालू करवाएं, तालाब खुदवाए और इंटीग्रेटेड फार्मिंग मॉडल पर वर्क शुरू किया। विशाल प्रत्येक आदिवासी परिवार से मिलते रहे उन्हें खेती से जुड़ी जानकारियां देते रहे और इन्हें मार्केटिंग के लिए भी प्रोत्साहित किया इसके साथ-साथ विशाल को अपनी मेहनत का फल नजर आने लगा और उनकी मेहनत धीरे धीरे रंग लाई। जो आदिवासी दो वक्त की रोटी के लिए भी काफी मशक्कत करते थे, वे आज अच्छी खासी कमाई करने लगे।
यहीं से विशाल ने किया नौकरी का त्याग
विशाल को यह समझ आ गया था कि यह सोच काम कर रही है, बस फिर क्या था 2016 में विशाल ने अपनी नौकरी छोड़ दी और उसके बाद दोस्तों के साथ मिलकर ग्राम स्मृद्धि नाम से एक ट्रस्ट चालू किया। जिससे उन्होंने इस ट्रस्ट में आहार मंडल के नाम से एक प्रोजेक्ट लांच किया। इसी के साथ विशाल का सफर जारी रहा और आज करीब 35000 आदिवासी किसानों का जीवन सवार चुके हैं। केवल साल भर की मेहनत के बाद ही उन्होंने 10 गांव को आत्मनिर्भर होना सिखा दिया। आज आदिवासी परिवार साल में दो से तीन लाख रुपए कमा रहे हैं।