देश में नकली और खराब दवाओं के कारोबार पर सरकार ने एक बार फिर बड़ा एक्शन लिया है। हाल ही में केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन सीडीएससीओ की जांच में देश भर में करीब 220 दवाओं के सैंपल फेल हो गए हैं। इसके अलावा दिल्ली और बेंगलुरु में नकली दवाओं के बड़े रैकेट का भंडाफोड़ होने के बाद मेडिकल स्टोर्स पर लगातार छापेमारी की जा रही है।
किस कानून के तहत होती है सख्त कार्रवाई?
भारत में दवाओं की क्वालिटी, उनकी मैन्युफैक्चरिंग और बिक्री पर नजर रखने के लिए औषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 लागू है। इस कानून के तहत नकली दवा बेचना या बनाना सबसे गंभीर अपराधों में गिना जाता है, जिसे और अधिक सख्त बनाया गया है ताकि इस धंधे को जड़ से खत्म किया जा सके।
नकली दवा बेचने पर कितने साल की होती है सजा?
अगर किसी मरीज को दी गई नकली दवा के कारण उसकी मौत हो जाती है या शरीर को बड़ा नुकसान पहुंचता है, तो आरोपी को कम से कम 10 साल की जेल होती है, जिसे आजीवन कारावास में बदला जा सकता है। साथ ही कम से कम 10 लाख रुपये या जब्त दवाओं की कीमत का तीन गुना जुर्माना लगता है।
यदि दवा नकली है लेकिन किसी की मौत या गंभीर चोट नहीं हुई है, तब भी दोषी को कम से कम 7 साल की जेल होती है जिसे उम्रकैद तक बढ़ाया जा सकता है। साथ ही कम से कम 3 लाख रुपये का जुर्माना देना पड़ता है।
संपत्ति भी हो सकती है जब्त
इस कानून के तहत सरकार को अपराधियों की संपत्ति जब्त करने का अधिकार है। यदि यह काम किसी फार्मा कंपनी के जरिए होता है, तो कंपनी के बड़े अधिकारी, डायरेक्टर और मालिक भी इसके लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार माने जाते हैं और उन पर भी मुकदमा चलता है।
