भारतीय महिला बॉक्सर परवीन हुड्डा ने Asian Games में स्वर्ण पदक जीतकर एक मिसाल कायम की है। 26 वर्षीय परवीन ने महिलाओं के 65 किलोग्राम भार वर्ग के फाइनल मुकाबले में चीनी ताइपे की चेन निएन-चिन को 3-2 के कड़े मुकाबले में मात दी। यह जीत सिर्फ एक मेडल नहीं है, बल्कि परवीन के संघर्ष और कभी हार न मानने वाले जज्बे की कहानी है।
22 महीने का बैन और घर में कैंसर की जंग
पेरिस ओलंपिक के लिए कोटा हासिल करने के कुछ ही महीनों बाद, 2024 में परवीन हुड्डा को वर्ल्ड एंटी-डोपिंग एजेंसी यानी WADA की तरफ से वेयरबाउट्स फेल्योर के चलते 22 महीने का बैन झेलना पड़ा था। उस दौर में परवीन का ओलंपिक में खेलने का सपना टूट गया था। वहीं दूसरी ओर, उनके पिता लखपत हुड्डा स्टेज-थ्री थ्रोट कैंसर से जूझ रहे थे और कीमोथेरेपी चल रही थी।
मुश्किल समय में परवीन की मां नीलम हुड्डा ने उनका हौसला बढ़ाया। परिवार के इस कठिन दौर में परवीन ने हनुमान चालीसा का पाठ करके खुद को मानसिक रूप से शांत रखा। उनके पिता अब पूरी तरह स्वस्थ हैं और इस गोल्ड मेडल ने परवीन के बॉक्सिंग करियर में नई जान फूंक दी है।
शुरुआती संघर्ष से लेकर ITBP में नौकरी तक
परवीन के बॉक्सिंग तक पहुंचने का सफर आसान नहीं था। शुरुआती दिनों में उनके परिवार को बॉक्सिंग ग्लव्स और जूतों के लिए रिश्तेदारों से पैसे उधार तक लेने पड़े थे और घर की भैंस का दूध बेचकर खर्च चलाना पड़ता था। अपनी मेहनत के दम पर परवीन ने कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पदक जीते। वर्तमान में वह ITBP में असिस्टेंट सब-inspector के पद पर कार्यरत हैं, जिससे उनके परिवार को मेडिकल और आर्थिक सहायता मिली।
वेट कैटेगरी बदलने की चुनौती
57 किलोग्राम भार वर्ग से 65 किलोग्राम भार वर्ग में कदम रखना परवीन के लिए आसान नहीं था। कोच अनिल मलिक और विदेशी हेड कोच सैंटियागो नीवा ने उनकी ताकत और स्ट्रेट जैब तथा लेफ्ट हुक के संयोजन पर काफी काम किया। इस नई भार वर्ग में उनकी लंबी पहुंच और फुटवर्क ने उन्हें फाइनल मुकाबला जीतने में मदद की और देश का नाम रोशन किया।
